Monday, 15 August 2011

तुम  एक  आस   थी
एक  अप्राप्य को  पाने  की  आस !
एक  प्यास !
त्रप्ति  थी  तो  बस  तुम्हारे   पास
इस  आस  और  प्यास  की  बलि  हुए  न  जाने  कितने   लोग !

जो थे अडिग , न तोड़ सकी उनको  कुंठा!
अब  तुम  विश्वास  हो
एक  अहसास  हो ,
चेतना   का  आधार  हो
खो  न  जाये  कहीं  ये  विश्वास
न  टूट जाये  फिर  हमारी  आस
एक  जुट  हो  यही   प्रयास
देश   की   अखंडता  और  स्वाधीनता  हो   अक्षुण
रहे  सभी  दिलो  में  देश  प्रेम  का  वास  !

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