Monday, 19 September 2011

अब  लौट  जाने  को  जी  चाहता  है
जी   न  सके  जो  पल  वो  जीने  को  दिल  चाहता  है 
काफिलों  से  घिरे 
अनेक  राहों  से  गुजरे

मिले  लोग  कितने  हर राह गुज़र
कुछ  बने  अपने  और  कुछ  अपने  बेगाने  हुए
हादसे   कुछ  खट्टे तो  कुछ  मीठे भी हुए

आज  सब  कुछ  भुलाने  को  जी  चाहता  है
जहाँ  से  चले  वही  लौट  जाने  को  जी  चाहता  है 

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