Monday, 31 October 2011

न गम है न कोई कमी है 
आँखों में फिर भी क्यों नमी है ,
तू मेरे सामने है 
फिर भी नजदीकी नहीं है ,
लबालब है दिल खयालो से
क्यों जुबान खुलती नहीं है,
जैसे नींद भरी हो आँखों में 
लेकिन वो सोती नहीं है,
मेरे वजूद का अहसास तुम्हे है या नहीं 
तुम ही बता दो कि मुझे पता नहीं है ....

Friday, 21 October 2011


हमदम  मेरे 
साथ  चल  कदम  दो  कदम
भूल  जाये  हम  अगर
न  भूल  जाना  तुम
आवाज़  दे  बुलाना  फिर
कि चले  थे  साथ  हम
कभी  कदम  दो  कदम 

Wednesday, 19 October 2011

एक  तरफ़्  तुम  हो  एक  तरफ़्  ये  जग  मुआ 
जो   तेरी  नज़र्  हुई   मन  ये  पुलकित  हुआ 

Tuesday, 18 October 2011

तेरे हुकुम को  बजाऊ तो कैसे ?
तेरी इबादत करू तो कैसे ?
तेरे खुलूस में जियू तो  कैसे ?
तू सामने तो आता नहीं 
तेरे होने का यकीन करू तो कैसे ...?

बादलों के  पार देख  न  पाई ,
तेरे  दिल  में  क्या है  जान न  पाई ,
अंकुश  न  लगा  अपनी  उड़ान  को ,
सीमा  अपनी  आँक न  पाई ,
अपने  ही  खयालो  में  गुम  रही
दर्द  तेरा  पहचान  न  पाई ...

Sunday, 16 October 2011

दो  बोल  तेरे
एक  मौन  मेरा
एक  मौन  तेरा  
सौ  सोच  मेरी ...

एक  दिल  मेरा ...
एक  दिल  तेरा ....
हर  रात  मेरी ....
हर  रात  तेरी ...
कुछ  ख्वाब  मेरा ...
कुछ   ख्वाब  तेरा ...
कुछ  सच  हुआ ..
कुछ  रह  गया ..
अब  तो  बस  तू  मेरा
और  में   तेरी .... :))

Tuesday, 11 October 2011



मन .
..
अर्थहीन  प्रश्नों  का  हल  ढूंढता  है

विचारो  की  श्रंखला  में  उलझ जाता   है


जीवन  के  निराशा  के   पलों में  एक  सहारा  चाहता  है 


आस  की  डोर  न  छुट  जाये  पकड़  बनाये   रखना


चाहता  है


जानता  है  हर  बात  फिर  भी  सत्य  को  क्यों  झुढ्लाना चाहता  है


शिकवा  शिकायत  करें  तो  क्यों


आप  सलामत   रहे सदा  यही  चाहता  है


जिनको   देखा ही  नहीं उनको  आँखों  में  बसाये  रखना  चाहता  है   
आंसू जो आँख से बह जाते हैं 
तेरे और करीब ले  आते हैं 

तेरे दीदार की तारीख  तये  नहीं होती 
आँख की कोर यूँ ही नम नहीं होती

आँख रोती है फिर भी मुस्कुराते हैं
सब्र करते हैं और बेसब्र हो जाते हैं
भुलाने की कोशिश में हर घडी याद करते हैं


 ur pain brings u closer to God.. 

date of death is not known and the wait is painful..



Thursday, 6 October 2011

अर्थहीन  प्रश्नों  का  हल  ढूंढता  है  मन
विचारो  की  श्रंखला  में  उलझता  है  मन
जीवन  के  निराशा  के   पलों में  एक  सहारा  चाहता  है  मन
आस  की  डोर  न  छुट  जाये क्यू  पकड़  बनाये   रखना
चाहता  है  मन
जानता  है  हर  बात,  फिर  भी , सत्य  को  क्यों  झुढ्लाना चाहता  है  मन
शिकवा  शिकायत  करें भी  तो  क्यों,
आप  सलामत   रहे  यही  चाहता  है  मन
जिनको   देखा ही  नहीं सपनो मे , क्यू  हकीकत मे  देखना  चाहता  है  मन 





Sunday, 2 October 2011


क्यों चुप रहने को कहा जाता है
जुबान चुप हो भी जाये  मन तो बोलता  है
एक दरिया है खयालो का का जो न थमता है
करता है सवाल खुद से और जवाब खुद ही देदेता  है
किसी  जिरह में   वक़्त कटi जाता है
क्या इसी तरह चुप रहा जाता है....???...शालिनी