Friday, 11 November 2011

क्यों  उम्मीद  की  ज़माने  से  अपनाने  की 
कि शर्म आती  है खुद से नज़रे मिलाने  की .
 गमो  से  अपने शायद       छूट   जाता  दामन

 शामिल हो जाती  दुआ अगर तुम्हारी  भी.
क्यों  आस  थी   उन  बेगानों  से 
जिनकी तो  आदत  है  सताने    की .
तू  मिल  जाता  अगर  कभी  तो  पूछते  हम 
क्या  जरुरत  थी  करीब  आके  जाने   की ..
जो   आंसू दिए  हैं   तुमने 
न हिम्मत   थी  उन्हें  बहाने 

 की ...

2 comments:

  1. जो आंसू दिए हैं तुमने न हिम्मत थी उन्हें बहाने की ...

    wah kya baat hai.....

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