Saturday, 14 January 2012

कुछ  रंग  भरने  चाहती  थी 

सभी  को  खुश  रखना  चाहती  थी 


मेरी  याद  मुस्कराहट  जगाये,  चाहती  थी 

क्यों  हर  रंग  कला  नज़र  आता है 


क्यों  कोई  खुश  नज़र  नहीं  आता  है 


चेहरों  की  सिलवटो में  मेरा  चेहरा  ही  क्यों  नज़र  आता   है ...


किसी  प्यार  के  काबिल  मै नहीं 


हर  लम्हा  कहे  जाता  है ....
हर  आशा 


एक  न्याय  की ,


धूमिल 


हो  जाती ,


निराशा  की  चादर  में  


सो  जाती ,

न  कोई  उसे  जगाता 


न  उसके  जाने  की  


आहट होती 


दो  पहर 


यू ही  बीत  चुके 


गुज़र  जायेंगे 


शेष  भी ....
फिर  वही  बेबस 


अंतहीन   पल ,


व्यथा 


तिरस्कार  की   वो  घुटन ,


जीवन   के  कम्पन 


और  ये  मौन  रुदन 

यही  है  नियति  मेरी .


दो  पल  की  ख़ुशी 


बिखर  जाती  है  कही 


dabdabyi   आँखों  से 


कुछ  भी  नज़र  अतi  नहीं .
..

Thursday, 5 January 2012

हर  मोड़  पर ,

देख पाती  हू  जिधर ,

तू  आता  नहीं 

नज़र .


मेरी  हर  आवाज़

लौट  आती है ,

क्या  सुन  सके  तुम

कभी उधर . 



दुनिया  में ,

कौन  है  ऐसा

जो  पा  सका

तुम्हे

हर  पहर



कोशिश  है

मेरी  भी

अलख जगाऊ

तेरे  नाम  की

तू  भी  तो  सुने

तर्ज़

मेरी  गुहार  की .



रौशनी   हो

तेरे  प्यार  की

कि

जगमगाए तू  भी

इस  लौ  में

यार  की....


रात की  बारिश  थमी  है अभी , 

एक  सैलाब  सा  बहा  था  कही 

एक  बूँद  ठहरी  है  अब 

हर  पत्ती की  कोर पे ,

 आखिरी बूँद 

सहेज  ली  हो ,

जैसे


 सतरंगी

सितारा  हो  कोई 

 ...