Wednesday, 27 June 2012

दिन  के  पिटारे  से   आग  सी  निकल  आती  है 
झुलसती  है  चांदनी  को 
रात भी जला देती है . 
 एक  पल  भी  ठहरती  नहीं 
शबनम  भी  कांप  जाती  है ..
परेशान  हर  शख्स नज़र आता  है 
क्या  दिलो  में  कोई  आग  बाकी  है  ??

Sunday, 24 June 2012


कदम युही डगमगाए 
गिरे और ज़ख्म भी पाए 
लहू के छींटे भी 
दिल  देहला न पाए 
 उन पत्थरो का 
जिन्हें सर पे
 बिठाया था
 शान से 

Saturday, 23 June 2012


चिलचिलाती धूप में 
 चिनगारी सी यह  धूल,
विषम   है  आग मन में 
मुरझाते  से सब  यह  फूल
जल रहा है  आग में संसार,
बीत न जाये जीवन की बेला
समय है बरसाओ रस फुहार  

Wednesday, 20 June 2012



कभी किश्ती गुम तो कभी साहिल गुम
कभी आँख नम तो कभी होश गुम
बदल जाते ही नज़र ऐ  दोस्त 
 मै हू  कौन और कौन तुम  ....

kabhi kishti gum to kabhi sahil gum
kabhi hosh gum to kabhi aankh nam
jo badal gayi teri nazar to
hu mai kaun , ho kaun tum...

Monday, 11 June 2012


क्यु सिखाया तूने सच की राह पर चलना
जानती नहीँ थी  इसमे दर्द है  कितना 


क्यु रोपे बीज नैतिकता के हमारी आत्मा मे
क्या  मालूम नहीँ थे उसमें काँटे हैं कितने


क्यु सुनायी वो कहानियां  जिनमें सच ही जीतता था
दोस्त, दोस्त ही होता था, प्रेम निश्छल ही जरूरी था
दुश्मनो को भी स्नेह दिया  जाता था
अपने ही नहीं गैरों को भी अपनाया जाता था 
नेकी और बहादुरी का ही जब काम हुआ करता  था


इस छल से भरी  दुनिया से निपटने का हुनर
क्यु ना सिखाया  तुमने
बुराइयों को अनदेखा करने का क्यु पाठ पढ़ाया तुमने ?


झूठ का कुछ  सुख भी  है अब ये सीखा हमने
कैसे बद्लू ,  मेरे वजूद का जो अब  हिस्सा है
वक़्त के साथ बदल जाऊँ कैसे सीखू अब मै ????



नहीँ दोष  है निरा तेरा
तूने तो तराशा था  गुणों     का पुतला
राग द्वेश से जो दूर रहे  सदा



 दुनिया ने हर पाठ है  दिया झुठला 
विवेक से काम लेने की कोशिश में  
आत्मा ने झकझोर दिया ....


  


kaash
samvedna supt
ya
chetna lupt
ho jaye
ya
jeene ka arth
badal jaye....


काश !!!
सम्वेदना सुप्त
या 
चेतना लुप्त
हो जाये
या
जीने का अर्थ
बदल जाये....

Sunday, 10 June 2012

/


zindgi
kuch ret si muththi se fisalti jaati hai
aur kuch
kadmo tale se leharen kheench  le jaati hain

hansti hain meri kismat pe
khuli hatheli me kuch lakire hi baaki hain

maut bhi jinhe cheen nahi pati hai..

is raah se gujare  na fir  koi
kadmo ke nishaan mitaane abhi baaki hain

Friday, 8 June 2012

jeevan ki is
yaatra me
ek hi dagar
har baar
achambhit nahi karti

ek hi jhalak

yu  
romanchit 
nahi karti
 
badalte hain
aankho ke bhav
har kshan
har pal



aahto se
hi
toot jaate hain
khamoshiyon 
ke tilism


bhor ki har 
kiran se
hota nahi
man vihwal



tu chaahta hai
har pal
adal badal..



kahan se 
jutayega
har pal
nayi 
chitwan!!! 



जीवन की इस 
यात्रा मे
एक ही डगर
हर बार 
अचम्भित नही करती


एक ही झलक
  नित
रोमांचित 
नहि करती


बदलते हैं 
आंखो के भाव
हर क्षण 
हर पल


 एक चुप 
से भी 
टूट जाते हैं
खमोशियो 
के तिलिस्म


भोर की हर 
किरन
 जीवन
नही भरती


तू चाहता है
हर पल 
अदल बदल..


कहाँ से 
जुटाएगा 
हर पल
नई 
चितवन!!!