Monday, 9 July 2012

एक कोमल एहसास 
जब पहली बार तुमको छुआ
गुलाबी हथेली को जब चूमा
अपने होंठ कठोर नज़र आये 


कैसा निरीह लगा जीवन
क्यों आयी तुम मेरे आँगन 


दुनिया की तकलीफों से कैसे बचाऊँगी मै
इस आपाधापी में कैसे सम्भालुंगी तुम्हे

तेरी इस कोमलता को कैसे संजोउंगी मैं 
अपनी ही ज़िम्मेदारी न सम्भाल पाई 
कैसे तुमसे न्याय करुँगी मैं 

एक नया एहसास जन्मा है तुम्हारे साथ 
पनपा है एक लता को आधार देने का बोध 
हर सोच अब तुम तक जाने लगी 
तुम में अब मैं नज़र आने लगी 

अपने ख्वाबो को शायद कुछ रूप दे पाऊं 
जो खुद न कर सकी राह उनकी तुम्हे दिखा पाऊं
अपनी तक़दीर की हर ख़ुशी तुमको दे पाऊं 

पर एक जुनून है कि ठहरता नहीं 
तेरी हर मासूम हंसी पर खिलता नहीं 
वक़्त की  मार तुम न देखो सोचती हु यही

एक सशक्त ढाल बन हर प्रहार रोक लू मैं 
तुम  मेरी कल्पना हो ..तुम्हे आकार  तो दे लू मैं.....



ये लिखते समय आंसू क्यों  भर गए आँखों में ...

  

No comments:

Post a Comment