Friday, 14 September 2012

एक स्वप्न
तुम दिवस के 
गूढ़ रहस्य 
चिर निंद्रा के 

अखंड तेज़ दिवाकर में 
फिर निस्तेज तिमिर में 

मै नतमस्तक होती हूँ 
मै तुम में हर पल जीती हूँ 
तुम में एक दिन खो जाउंगी 
तुमको पाकर भी न पाऊँगी ... 
भ्रमित सी मै अंत हो जाउंगी ..

कर प्रसार तुम दिव्य ओज 
एक बार तो रूप उजागर करना
मन प्राण मेरे फिर हर लेना। ....

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