Saturday, 20 October 2012

एक देहलीज़ पर टिका हुआ वक़्त है तू
घर में कहर.. बाहर बेकदर
badastur chalega jeevan
wahi subah wahi raat din..
यह कमाल है तेरे तेवरों का 
कि बात बिगडती गयी, बनाने में....
थमा दिया है एक टूटे कांच सा अपना वजूद 
अब तेरे हाथ में है बिखरने दे या समेट ले ...
यूँ न संजीदा बना मुझको 
हसने का शौक अभी बाकी है मुझमे... 

Tuesday, 16 October 2012

फरेब के समुंदर में
झूठ की किश्ती खेता है..
हर रोज़ वो बिकता है 
हर पल वो मरता है
सच सामने आ जाये 
तो
राह बदल लेता है...
-शालिनी
बड़ी मुश्किल से उनकी दुनियादारी समझ में आई
वो मुस्कुराते रहे और रंजिशे भी निभाईं...
-शालिनी