Thursday, 13 December 2012


मैं कैसे तुमको समझाउं 
मन कितना विचलित होता है 
जब तेरी बातों पर 
अमल नहीं हो पाता है 
तुम कहती हो डरना मत 

पर ..मैं डर जाता हूँ
अँधेरे से घबराता हूँ 
कुछ साये जैसे चलते हैं 
वो मुझसे कुछ कुछ कहते हैं
वो मेरे पीछे आते हैं
मैं तेज़ कदम बढ़ाता हूँ ..
उन सायों से पीछा छूटे जो 
मैं सरपट दौड़ा आता हूँ ..
साँसे कानों में फटती हैं 
तुम कहती हो डरना मत 
लेकिन मैं डर ही जाता हूँ ...

तुम कहती हो रोया नहीं करते 
बहादुर कहलाने वाले को 
दर्द छुपाना आता है ..
वोह आंसू सब सह जाते हैं 
कोई जान नहीं पाता है 
मैं अक्सर कोशिश करता हूँ 
कुछ मुश्किल से चुप हो पाता हूँ 
कोई देख न पाए आंसू 
मैं छुप छुप कर रो लेता हूँ 

मन को कैसे समझाऊं 
रोने का अधिकार भी क्या कोई होता है ?
मिटटी से इस ह्रदय में 
सब जज़्ब कहाँ होता है ?
आंसू जब छलने लगते 
तुम कहती हो .. रोया नहीं करते ...

मैं कैसे निष्ठुर हो जाऊं ?
इस दुनिया की खातिर मैं 
कैसे खुद को खुद से खो जाऊं ?
जीने की इस दुविधा में 
मैं बद से बदतर हो जाऊं ...?
तुम मेरे हित में कहती हो 
मैं हित अनहित के भंवर में 
बिलकुल भ्रमित ना हो जाऊं ....

-sks

13 comments:

  1. वाह क्या बात है ... सच बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है आपने एक आतंरिक भाव-व्यथा जो सत्यता के बहुत नज़दीक है ..... सचमुच आप एक कवियत्री है ...

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  2. Behad sunder shabd dii......Touched my heart....

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  3. बेहतरीन रचना है

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