Tuesday, 12 February 2013


रूठ जाएँ शब्द मुझसे

और मैं निःशब्द हो जाऊं ..
यह जग मुझसे 
और 
मैं दुनिया से 
अलग हो जाऊं ....



 पर ..

मैं कैसे विमुख हो जाऊं ..
क्यूँ न ..
शब्दों को जोड़ कर 

भाषा का रुख मोड़ कर 

मैं अपने भीतर ले आऊँ 
पल भर ..
मैं भी विस्तृत हो जाऊं,
और .. 
जग को विस्मित कर जाऊं ....

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