Friday, 14 June 2013

  अलसाती सुबह 
अलार्म को चोंक के बंद करते 
नींद से जागना 
अब सुहाना न रहा 

 वो कोयल की कूकें 
वो चिड़ियों का चेह्चाहाना 
वो सूरज की सीधी किरणों का
आँखों को बींध जाना 
चुन्धिआय़ी आँखों में 
फिर से सो जाना .. अब नहीं रहा ..

सिमट गए हैं लोग कमरों में 
वो आँगन में चौकी लगाकर 
मिलजुल कर खाना-खिलाना कहाँ रहा ..


 देख बंद डब्बों में सजा खान मेजों पर 
याद आती हैं वो चूल्हे से उतरती 
फूली हुई रोटियाँ ..
माँ के हाथों से गर्म  टुकडो में 
रोटियों का बंट जाना  न रहा ..


 वो पूरी कचौरी , मिठाइयाँ 
गर्मजोशी से मिलना मिलाना न रहा ...
कारों गाड़ियों में दौड़ती दुनिया 
थक के चूर होती आरामदेह जिंदगियां ...
शाम ढले वो पानी की फुहारें,.. 
आँगन में बैठ दास्ताने-दिन
सुन्ना  सुनाना  न रहा ....

दूर कर दिए अपने ऐयर कंडिशनरस ने ..
खुली छतों पर चांदनी बिछाना ,
दादी बाबा के लोरी से किस्से कहानी .
आपसी प्यार दुलार का जमाना कहाँ रहा ..

 मोबाइल्स कंप्यूटरस में कैद होते 
अपने बेगाने ..
पास बैठे लोगो को समझना 
अब कहाँ रहा .....

-शालिनी 

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