Sunday, 10 August 2014

इसकी उसकी जान लीजिये 
फिर अपने दिल की मान लीजिये.... !!
महज़ बारिश नहीं ..

नियामत की बूँदें हैं 
बादलों की ज़हमत से ... !!
अहम हो या वहम 
भ्रम हो या भ्रान्ति
उसूल हो या विवेचन
मनःस्थिति के सब उपक्रम
बंध सका न कोई
न तुम...न हम....!!!!
-शालिनी
बड़ी सख्त बयानी करते हो
कहीं जुबान में हड्डी तो नहीं....
एक मौन 
या प्रलाप..?
एक विश्वास 
या प्रमाण..?
प्रतिनिधि तुम 
या निष्प्राण ...?
एक रूप 
या निराकार...?
क्या खोज सके तुम 
प्रेम का आधार ....???
-शालिनी

Tuesday, 8 July 2014

Do kadam ka hi to faasla hai
Ek kadam tera
Aur ek mera.... 
Sks
Mere jaise tum ho hi nahi sakte. .
Teri bhookh pyaas alag hai mujhse. ...!!!!
Sks♡
Nahi kar sakte agar saleeke se dosti
To saleeke se dushmani nibha lo ... 

Hazaro virtualies ka dam bharne walo
Ghar me koi ek rishta to sambhalo .... 
Sks♡
रूबरू हो जाओ शायद मुझसे 
जाओ ..ज़रा ढून्ढ लो पहले खुद को...
-शालिनी
करो ना अब फ़ैसला.. 
मैं बुरी या भाग्य बुरा... 
मैं वारूं जग सारा 
या जग ने मुझपे वार किया....
धरती तेरी ..अंबर तेरा, 
तेरी रातें.. दिन है तेरा
मैने कब इन्कार किया......
दैहिक भौतिक इस काया का 
मैने बरबस उपहार लिया...
इन संस्कृतियों को जीने में
मैने क्या उपकार किया...
तेरे बंधन ..मेरे संयम
तेरे मर्म ..मेरे कर्म
मैने कब अपवाद किया ..
करो ना अब फ़ैसला
मैं बुरी या भाग्य बुरा ??
-शालिनी
गम सहो और मुस्कुराओ ,
जियो या मर जाओ ,
दिल की बात.. 
- न बताओ 
- न सुनाओ 
- न दिखाओ .. 
sks♥
देखती हूँ अक्सर ..
पत्तियों की कोर पर 
झिलमिलाती 
चांदी सी बूँदे ...
बिना सहारे झूलतीं 
अब गिरीं तब गिरीं ...
हलकी सी हवा ,
पत्ती का कम्पन
सहमाता तो होगा
उसका अंतर्मन ....
खुद अपना बोझ लिए
और कुछ पल और
फिर तो गिरना ही है ...
यह अवलम्बन
यात्रा का हिस्सा भर ...
आसमान से धरती तक
बहते हुए
ज़ज़्ब होने तक ,
अपने जीवन से
जीवन तक !!!!!
-शालिनी

Thursday, 22 May 2014

रोज़ नए चेहरे बदलते हो नए लोगो के लिए ..
एक रोज़ हर चेहरा बेनकाब हो जाता है ....
अपनी आँखों में गौर से झांको एक बार ..
अपना चेहरा भी कभी नज़र आता है ... ????
-शालिनी


अक्सर तुम्हारा अहसास किया है मैंने 
न होते हुए भी होने को जिया है मैंने 
तेरी बातें जब रुला जातीं 
कभी जी लिया कभी मर लिया मैंने 
नफरतों को पाला नहीं 
जो हुआ अच्छा हुआ कह 
सब सह  लिया मैंने। … 
उम्र की इस देहलीज़ पर 
पाकर अब कुछ खो न  दूँ 
किस्मत से भी लड़ लिया मैंने  … 
तुम समझो न समझो 
अपनों को अपना समझा मैंने। . 
अपनी समझ से जब समझा 
नासमझ कह दिया तुमने। …… 


बस एक हवा का झोंका था 
रेत  में दबे ख्वाब फिर उधड़ आये  .... 

हसरतें पलट आती हैं पन्ने  माज़ी के 
वो क्या जानें  पलट कर वक़्त फिर आता नहीं  .... 




कानों में गुनगुनाती हैं सदायें तेरी 
हवाओं  ने जब भी मुझे आ कर छेड़ा है। … 
बेआवाज़ कदमों से धीरे से 
सपनों की दुनिया में 
आते देखा है तुमको . . 

आँखें मूंदे सपनों में 
सपने बुनती जाती हूँ  . . 

तेरे आने और जाने में 
सदियों सा जी लेती हु … 

वो गर्म हथेली हाथो में 
बोसा-ए -गर्मी गालों पर … 

साँसों में साँसों की रुनझुन 
उलझे उलझे से हम तुम…

सपनो में सपने बुनती हूँ 
तुमको चुनती रहती हूँ  … 
और बस सोचा करती हूँ 

क्या तुम भी सपने बुनते हो 
सपनों में मुझको चुनते हो  …? 

Friday, 9 May 2014

क्यों बांधता बन्धनों में 
अपना आज और कल ?
विलुप्त हो जाती हर चीज़ .. 
चल या अचल !!
मुक्त उसने भी तो रक्खा ..
मंद समीर हो या नीर विकल.. !!!
-शालिनी

अच्छा हुआ जो किस्मतें हमारी 
उसने अलग अलग लिख दीं 
कभी मेरी अच्छी 
तो कभी तेरी अच्छी … !!

तेरी अच्छी तो तू मुझे संभाल,
और मेरी पर तू मुझे खंगाल
यह देख अल्लाह का कमाल
किसी को नहीं किया कंगाल
तू भी मैं भी , दोनों मालामाल !!
अच्छा हुआ जो किस्मतें हमारी
उसने अलग अलग लिख दीं .......
 

Saturday, 3 May 2014

पथिक !!
धीरज रख..
तू ही कर्म है 
तू ही है प्राण...

वेग उद्वेग 
एक समान....
गति की 
सीमा नही 
असीमित हर उड़ान...

तृष्णा सुधा
जीवन पर्याय ...
ध्यान भाव
मन का आधार...
निर्विकल निर्बाध चल

ठहरे कहाँ....
पीड़ा हो या सुख गहन
समय आबद्ध है
जीवन का हर पल....
पथिक तू
बस चला चल ...!!!!
-शालिनी
दो तसल्ली.. झूठी ही सही 
क्या पता दिल बहल जाये ..!!

मैं चंद साँसों का बाशिंदा 
आखिरी.. तेरे दर पर 
निकल जाये...!!

तेज़ बहुत धूप है तेरे जहान में 
कहीं कोई तारा न झुलस जाये .. !!

लावारिस से ख़याल थे
बेवज़ह चले आये.... !!
लाख़ कवायतें 
ढर्रा वही ..


सुकून की नींद 
पर चैन नहीं ..


आँखों से उतर कर ख़्वाब 
रास्तों में मिलते नहीं..

Tuesday, 15 April 2014



कदम रुक जाते हैं हेंगर पर लटकी छोटी छोटी फ्रॉक देखकर 
उँगलियाँ मचल जाती हैं दो चोटियां बनाने को 
गहराते वक़्त और ये सँकराते गलियारे 

न यादें, न बातें, और न कारवां 


बस मुसाफिर थके हारे…!!!!
पानी से लिखे अफ़साने 
किसने पढ़े ..किसने जाने ...!!!



तेरे बग़ैर रुकते नहीं दुनिया के काम 
दस्तूर है किसी को तो आना है किसी के बाद … !!



मत पूछो कितना मसरूफ़ है ये दिल 
धड़कने के सिवा इसे कुछ काम और भी हैं… !!!

 

गवारा नहीं मुजस्समों में झांकना मुझको 
कहीं कोई अपना बेआबरू न हो जाये … !!

 

तुझसे रुखसत माँगू मैं एक उम्मीद लेकर 
तुम एक बार तो कह दो कि  दिल अभी भरा नहीं   … !!!

दरख्तों ज़रा अदब से बढ़ो ...
बेतरतीबी ज़ुदा न कर दे 
तुम्हे डालियों से कहीं .... !!!!!
जज़बातों से खेलते हैं ये सियासती लोग 
मोहरे बनाते आयें हैं आपको यह लोग ..

जीत का जश्न मनाएं या हारें यह लोग 
काम आपका ही तमाम कर जायेंगे यह लोग ..

खून के आंसूं पीते हर कौम के लोग 
मुसलसल नफरतें बढ़ाये जातें हैं ये लोग ...

बटवारों के दांव हर पल खेलते हैं 
आपकी सरज़मीं पर..   बिसातें  बिछाये बैठे हैं ये लोग ....

इंसानी वहशतों के शिकार हैं यह लोग
मतलब के बाद देखिएगा ....कहाँ हैं आप और कहाँ यह लोग ...!!!!!
किस ख़लिश ने कर दिया बदरंग पत्तों को .. 

कोई नब्ज़ पेड़ की देखे तो मर्ज़ पहचाने..... !!!





Thursday, 6 February 2014



हाँ करके ना करती हैं  … 

ख्वाहिशें
खुद-बा-खुद  क़त्ल होती हैं . . 


पल पल जिए पल की  ख़ुशी की  ख़ातिर 
हर रोज़ मरे इस ज़िंदगी की खातिर  . . 



जिन धड़कनों में तू बसा रहा 

साँसों से ही न उनका वास्ता रहा.। 

हो न हो मेरे बस में  ज़िंदगी अगर 

तेरे अख्तियार में बस तेरा गुरूर है। 

मैं वह शह  नहीं जिसे तू मात दे 

तेरी शह में तेरी मात जरूर है।  . 

मेरे जूनून कि हद मैंने देख ली 

कि बिखर बिखर कर राख फिर समेट  ली। 

ये जो, 
एक मैं हूँ मेरे अंदर ,
अजनबी सी लगती है.. 

कभी मुझ से मिलती 
कभी नज़दीक आती है
एक पल मे फिर कही दूर चली जाती है..

वाकिफ़ मेरे हाल से नहीं  लगती
यूँ मुस्कुराए चली जाती है..

रुक.. एक नज़र देख तो लूं
क्यू नज़रें बचाए जाती है ...
पंछी नीड़ से जब दूर जाने लगें
वक़्त अपना भी आ गया समझो ..

कहाँ मिले हैं सिरे और ताने बाने उजालों  में 
उलझते रहे ख्वाब पलकों के अंधेरों  में। 
जरूरतों के हुज़ूम में 

अहमियत तय करना है।

 . 
मायूसियों से दूर रह कर


कुछ तो संयम रखना है। ..
मैं सर्द हवाओं को कहती हूँ 
गर्मी-ए-लहू को छू कर तो दिखा ..
जिस दौर-ए- जुनूँ मे दौड़े वो

तू पा भी ना सके उसका पता ..
एक दौर यूँ भी गुज़रा
खुशियों के दामन मे
बहुत गमजदा रहे .. वक़्त की मुट्ठी मे दफ़्न
खुद को भूले रहे .. रिस्ता रहा लहू आँखो से
ज़ज़्ब लम्हा लम्हा करते रहे.. तारीख बदलती रही रोज़ाना
..ज़ख़्म भरते उभरते रहे .. इंतेहा-ए-सुकून अब है लेकिन..
ज़िंदगी मिलती रहे बिछड़ती रहे..