Thursday, 6 February 2014



हाँ करके ना करती हैं  … 

ख्वाहिशें
खुद-बा-खुद  क़त्ल होती हैं . . 


पल पल जिए पल की  ख़ुशी की  ख़ातिर 
हर रोज़ मरे इस ज़िंदगी की खातिर  . . 



जिन धड़कनों में तू बसा रहा 

साँसों से ही न उनका वास्ता रहा.। 

हो न हो मेरे बस में  ज़िंदगी अगर 

तेरे अख्तियार में बस तेरा गुरूर है। 

मैं वह शह  नहीं जिसे तू मात दे 

तेरी शह में तेरी मात जरूर है।  . 

मेरे जूनून कि हद मैंने देख ली 

कि बिखर बिखर कर राख फिर समेट  ली। 

ये जो, 
एक मैं हूँ मेरे अंदर ,
अजनबी सी लगती है.. 

कभी मुझ से मिलती 
कभी नज़दीक आती है
एक पल मे फिर कही दूर चली जाती है..

वाकिफ़ मेरे हाल से नहीं  लगती
यूँ मुस्कुराए चली जाती है..

रुक.. एक नज़र देख तो लूं
क्यू नज़रें बचाए जाती है ...
पंछी नीड़ से जब दूर जाने लगें
वक़्त अपना भी आ गया समझो ..

कहाँ मिले हैं सिरे और ताने बाने उजालों  में 
उलझते रहे ख्वाब पलकों के अंधेरों  में। 
जरूरतों के हुज़ूम में 

अहमियत तय करना है।

 . 
मायूसियों से दूर रह कर


कुछ तो संयम रखना है। ..
मैं सर्द हवाओं को कहती हूँ 
गर्मी-ए-लहू को छू कर तो दिखा ..
जिस दौर-ए- जुनूँ मे दौड़े वो

तू पा भी ना सके उसका पता ..
एक दौर यूँ भी गुज़रा
खुशियों के दामन मे
बहुत गमजदा रहे .. वक़्त की मुट्ठी मे दफ़्न
खुद को भूले रहे .. रिस्ता रहा लहू आँखो से
ज़ज़्ब लम्हा लम्हा करते रहे.. तारीख बदलती रही रोज़ाना
..ज़ख़्म भरते उभरते रहे .. इंतेहा-ए-सुकून अब है लेकिन..
ज़िंदगी मिलती रहे बिछड़ती रहे..