Thursday, 6 February 2014

एक दौर यूँ भी गुज़रा
खुशियों के दामन मे
बहुत गमजदा रहे .. वक़्त की मुट्ठी मे दफ़्न
खुद को भूले रहे .. रिस्ता रहा लहू आँखो से
ज़ज़्ब लम्हा लम्हा करते रहे.. तारीख बदलती रही रोज़ाना
..ज़ख़्म भरते उभरते रहे .. इंतेहा-ए-सुकून अब है लेकिन..
ज़िंदगी मिलती रहे बिछड़ती रहे..

2 comments:

  1. bahut khoob likhti hain aap....
    D N Singh

    ReplyDelete
  2. wah bhabhi ji
    lekin ab thoda topic badaliye

    ReplyDelete