Sunday, 10 August 2014

इसकी उसकी जान लीजिये 
फिर अपने दिल की मान लीजिये.... !!
महज़ बारिश नहीं ..

नियामत की बूँदें हैं 
बादलों की ज़हमत से ... !!
अहम हो या वहम 
भ्रम हो या भ्रान्ति
उसूल हो या विवेचन
मनःस्थिति के सब उपक्रम
बंध सका न कोई
न तुम...न हम....!!!!
-शालिनी
बड़ी सख्त बयानी करते हो
कहीं जुबान में हड्डी तो नहीं....
एक मौन 
या प्रलाप..?
एक विश्वास 
या प्रमाण..?
प्रतिनिधि तुम 
या निष्प्राण ...?
एक रूप 
या निराकार...?
क्या खोज सके तुम 
प्रेम का आधार ....???
-शालिनी