Tuesday, 29 September 2015

सपने आँखों में बदस्तूर दीखते रहे   ...तुम कभी  ढीले ढाले, थके हुए, कमजोर , कभी ख़ुश चुस्त और प्यारे ...  कब आजाते और कब चले जाते  पता ही नहीं चलता  ... सुबह लगता  ही नहीं कि सपना था .. एक अहसास दिनों दिन  बना रहता। . तुम्हारे पास रहने का ..
जी करता है हर रोज़ तुमको बता दूँ लेकिन सपने भाषा मे, शब्दों में न आना ही अच्छा है  . अब नहीं बताउंगी तुम्हे कुछ .. पहले गलती कर दी अपने मन का सब बता कर ... तुम्हारी सोच को एक दिशा देकर .एक उम्मीद को रास्ता देकर !
लताड़ती हुई सीमाओं से रोज़ उलझना , अपने दायरो से तुम्हे आगाह करना, मूक. संवाद से रोज़ निपटना बहुत थका देता  मन को।  
  लेकिन तुम्हारी उम्मीद वैसी ही बनी रही ... जिसका लक्ष्य सिर्फ देह भर थी ..न अपनापन, न कोई मतलब था तुम्हें। ... तुम्हारा मन भटकता है .. इधर उधर ... जिसको नाम पहचान अस्तित्व से कोई सरोकार नहीं। नाम कोई भी हो किसी का भी हो। . बस देह हो।  और - और की चाहत I  कभी न ख़त्म होने वाली   क्षुधा ... 
दर दर भटकाव वितृष्णा से भर देता है तुम्हें i जुबान  कड़वी हो जाती है i आहत होना और आहत करने का ज्ञान ही रह जाता है . दिल दिमाग एक आग में जलता रहता है . आग बुझते ही पैरों तले राख की तरह रह जाती देह को छोड़ ... फिर नयी आग सुलगाना और यही क्रम बार बार . नहीं मालुम ये सच है सही है, या गलत है, पर स्थिरता नहीं है। जमाव जुड़ाव नहीं है कहीं भी। . कोई बंधन नहीं जो जकड के रखे कोमल प्यार से से। .
और फिर , असफलता अधजली लकड़ी की तरह धुआं देने लगती है . जिसके पास न रह सकते न सह सकते . कुछ ऐसा ही धुआं जब भर जाता है  तुम्हारी आँखों में ..तुम चले जाते हो  . .. धुंए से दूर , बहुत दूर..... !!

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