Monday, 19 October 2015

18/102015

मौसम की ढंडक अब
ज़िंदगी में उतर चली है
साल महीने उम्र बढ़ चली है...
अचानक लगता है
अब समय कम है 
वक़्त के हाथ बस छूटने को हैं ...
और ज़ेहन में कौंध जाते है
हज़ारो अनकहे अनकिये काम
जी चाहता है
घडी की सुइयाँ रोक लूँ ,
जो छूट गया सब समेट लूँ ,
स्वच्छंद आसमान में उड़ चलूँ ,
हाथों में तेरा हाथ थाम लूँ ....
सतरंगी इन्द्रधनुष ओढ़ कर
कुछ रंग तुम पर भी चढ़ा दूँ ...
और मस्त हवा में मचल जाऊं
खिलखिला कर सब दिशाएं हंसा दूँ
और एक हंसी तुम पर भी सजा दूँ ...
चूम लूँ सब चाँद तारे
खग विहग और फूल सारे
और कपोल तेरे भी लाल कर दूँ ....!!!
हँसते हैं मुझ पर मेरे स्वप्न सारे
जानते हैं मैं विमूढ़ बैठी रहूंगी
वक़्त को जाता देखती रहूंगी
ख़ुशी की बाट जोहती मैं
स्वप्न में डूबी रहूंगी...!!!
धरा से उठना हो तो
हिम्मत चाहिए ...
सिर्फ़ सोच नहीं
उड़ान चाहिए ..
कमजोर नहीं
मन बलवान चाहिए ...!!
-शालिनी

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