Friday, 11 March 2016

महिला दिवस पर...
इक्कीसवीं सदी में जी रही हूँ
पहचानती खुद को नहीं हूँ मैं,
नित नए आवरण समेटे 
अस्तित्व निज बुन रही हूँ मैं,
आईने में झांकती हूँ
दुर्गा नही , सरस्वती भी दिखती नहीं मैं,
सजी धजी अप्सरा भी लगती नहीं मैं ,
घर को समेटे ह्रदय में एक धुरी पर घूमती
धर्म से बंधी, कर्म को जी रही हूँ मैं ,
आशा अभिलाषा कामना शुधा सब सूक्ष्म हैं
मेरे अंश अंश के लिए जी रही हूँ मैं ,
मैं जानती हूँ मानती हूँ उस जग को
नाप लूंगी कुछ कदम में इस जहाँ को ..
लेकिन घर से आगे नहीं स्वर्ग कोई
सत्य यही जानती हूँ इसी सत्य को जी रही हूँ..
क्या हुआ अगर इक्कीसवीं सदी में जी रही हूँ मैं.....!!!
-शालिनी
9/3/2016

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