Sunday, 28 August 2016

ऊब न जाऊं ओट नज़र के कर देती हूँ
सफ़ा  नए सिरे से फिर शुरू करती हूं ...!!
अक्स क़दमों के कुछ दूर लिए जाते है
रास्ता फिर नया खुद तलाश करती हूँ...!!
मंजिलों में तुम हो या तुम ही मंज़िल हो
सफ़र तो सफ़र है बस इसलिए  सफ़र करती हूं...!!!
-©शालिनी

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