Wednesday, 24 August 2016

कब देखते हो 
दर्पित हिम आच्छादित चोटियाँ,
कल कल करती सरिता की मस्त अटखेलियां ,
हवा के आँचल पर लहराती धान गेहूं सरसों की कोमल बालियाँ, 
बारिशों के पानी में सनती सोंधी मिटटी की नालियां,
कब देखी तुमने फलों से लदी रंगबिरंगी  डालियाँ ....???

तुमने बनालीं  ऊंची ऊंची अट्टालियाँ,
मशीनों पर मशीनों सी चलती रहती  तुम्हारी उँगलियाँ,
कंकरीट में रहते रहते खो दी तुमने सारी अनुभूतियाँ,
पत्थर से शहरों में पत्थर सी होने लगीं नज़दीकियां,
अतृप्त जीवन से ले ली तुमने कितनी संजीदगियां,
तुम क्या जानो वात्सल्य प्रकृति का 
और बच्चों सी किलकारियाँ ....!!!
-शालिनी
21.6.2016

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