Wednesday, 24 August 2016

प्रेम मर्म है, दर्प है, सतत आशीर्वाद  है 
 धरा का  अंतहीन सतरंगी आकाश है ..
लेकिन..
प्रेम की आस्था जब देह हो जाये ,
भावना जब सारी अपदस्थ हो जाये,
मर्म जब निस्ताप हो जाए, 
रुको ज़रा ठहर कर देखो...
शायद
स्वप्नाकाश  विस्तरित  हो जाये..
या फिर 
अवचेतना सर्वथा लोप हो जाये....

क्या अर्थ है विमुख हुए प्रेम का ..
एकल ..राह पर फिर मौन का ??
छोड़ दूँ राह यही विकल्प है ?
नेत्र सजल और प्रेम अल्प है ...

प्रेम है तो अंत हुआ कैसे
शाश्वत भाव शेष हुए कैसे
यथार्थ नहीँ  तो स्वप्न हुए कैसे
सोचती हूँ कोई जीतता नहीं
 तो फिर  हारता है कैसे ?
-शालिनी
14.2.16

ता उम्र   दफन रहा 
यह है या नही किसे याद रहा..!!

ज़ज़्बा-ए-मोहब्बत जो उफन गया  
दिल,कभी आबाद हुआ कभी बर्बाद हुआ..!!

रोज़ चमकता रहा आसमानों में 
इश्क ने दिखाया तब चाँद हुआ ..!!

परछाइयाँ तन्हाईयाँ बदगुमानियां बेमतलब थीं 
  पता चला जब सामना रौशनी से हुआ..!!

साज़ आवाज़ सुर और लफ्ज़ सब बेमानी थे 
  ज़ेहन में उतर गए सब, रुख  जब ज़िंदगी से हुआ..!! 
  
रोज़ पढ़ते थे किस्से,  हमराज़ दोस्तों  के थे 
बुलबुले गुलगुले हुए, हादसा जब   खुद से हुआ..!!

-शालिनी

बदलती तारीखों में ..
बढ़ती उम्र में ..
बस ज़िंदगी कम हो जाती है !
कम ओ बेश, 
और कुछ नहीं बदलता ..
न ख्याल, न मन और न तुम ...!!!

sks<3
11.2.16

यहाँ कुछ तो है जो लुट जायेगा..
बंद तालों पर लिखा होता है अक्सर..!!

sks<3

बेबाक नहीं.. बेहया भी नहीं 
खुद अपना हाल कहूँ ..
अब  ये हाल भी नहीं ..!!!

sks<3

मैं किनारा क्या करूँ.. खुद जो किनारे पर हूँ 
तुम न देना मुझे  .. मैं खुद ही तसल्ली में हूँ ...!!

sks<3

इरादा है , वादा नहीं .... चलने का   
 यह  रास्ता  मेरा है...! 
  
उस तरफ  कौन जाने क्या है 
अच्छा लगता है मुझे  
यह सफर, जो सिर्फ मेरा है.. !!

-शालिनी

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