Tuesday, 6 September 2016

शब्द लड़ते रहते हैं रात भर..
सुबह मौन हो सो जाते हैं थक कर..
मैं तक़रीर कोई कब तक लिखूँ
वो किनारे सरका देते हैं पढ़ कर..
सौ दफ़ा पढ़ती हूँ खुद का लिखा
सिलवटें उनकी पेशानी पर सोच कर ..
फेहरिस्त लम्बी होती ही जाती है
सवाल सवालों से करते हैं ....
जवाबो की राह देख कर.... !!!!
-शालिनी

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