Monday, 27 March 2017

[27/03, 10:36 a.m.] 

 ये जो 'तुम' हो न ...!!
किसी की स्याही का रंग 
किसी के शब्दों की आत्मा 
किसी के दर्द की गहरायी 
किसी का इंतज़ार 
तो किसी का  ख्वाब ...!

ये 'तुम' ही हो न...
किसी का प्यार 
किसी का खुमार 
किसी की बेचैनी तुम से है
तो किसी के तुम करार .…!

तुम्ही से रंगीनियां 
 रागनियां तुम से
तुम ही तो हो बहार ...!!

ये 'तुम' ही हो न ..
किसी नयन कोर के मोती
या किसी आँख के नूर ..!

'तुम' यहाँ वहां 
न जाने कहाँ कहाँ...
कवि की कल्पना में
कविता के सार में
कहानियों के पात्र में
ग़ज़ल  की तान में...!

सूरज के तेज़ मे
सुलगती शीतल चांदनी में
गर्म लू  या बयार में..!

तुम कल्पना 
तुम सत्य
तुम आस 
तुम विश्वास 
तुम हो तो है सब 
तुम ही आधार ..!

और इधर एक 'मैं' ...
इस विशाल संसार में
उस तुम की परछाई में
खोजती खुद को 
बहते वक़्त में 
क्रमशः विलीन...!!
-शालिनी

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