Monday, 27 March 2017

एक संवाद चलता रहता है
हर मन के भीतर ...
मौन जिसको कहते हैं
बहुत कोलाहल में होता है अक्सर...
अवचेतन सचेत रहता है 
सुप्त बीज सा अंदर...
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जाने क्या क्या कहती हूं,
जाने क्या क्या सुनती हूँ,
एहतियातन 
छोड़ परे झूठ मूठ की बातें...
..सच से वाकिफ़ रखती हूं,
सच पूछो तो दुनिया भर में 
सबसे ज़्यादा 
मैं खुद से बातें करती हूँ ...!!!
-शालिनी
17.1.2017

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